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पश्चिम बंगाल का रसगुल्ले पर लम्बे समय से एकाधिकार था। पूरी दुनिया में बंगाली रसगुल्लों का नाम था। लेकिन ऐसा दावा है कि इन रसगुल्लों का मूल ओडीशा से जुड़ा है यानी कि दुनियाभर में मशहूर इन बंगाली रसगुल्लों की शुरुआत ओडीशा से हुयी थ। जी हाँ, आपको बता दें कि इसी बात को लेकर ओडीशा और पश्चिम बंगाल में साल 2015 से रसगुल्ले की शुरुआत को लेकर जंग चल रही थी, जो कि अब पूरी तरह से समाप्त हो गयी है, क्योंकि अब ओडीशा को भी अपने रसगुल्ले के लिए बहुप्रतीक्षित जीआई टैग यानी कि भौगोलिक संकेत मिल गया है।
जी हाँ, आपको बता दें कि अब बंगाली रसगुल्ले की तरह ओडीशा के रसगुल्ले को भी ‘ओडीशा रसगुल्ला’ के नाम से पूरी दुनिया भर में जाना और पहचाना जाएगा। हालाँकि ये जानना भी दिलचस्प है कि वर्ष 2017 में पश्चिं बंगाल को पहले ही जीआई टैग मिल गया था। दिलचस्प है कि ओडीशा के रसगुल्लों का ज़िक्र 15वीं सदी के उड़िया काव्य ‘दांडी रामायण’ में भी मौजूद है, क्योंकि रसगुल्ला भगवान जगन्नाथ के लिए निभाई जाने वाली ओडीशआ की सदियों पुरानी परम्परा का हिस्सा रहा है।
क्या है जीआई टैगः
भौगोलिक संकेत एक प्रकार का मुहर है जो किसी भी उत्पाद के लिए प्रदान किया जाता है। इस मुहर के प्राप्त होने के जाने के बाद पूरी दुनिया में उस उत्पाद को महत्व प्राप्त हो जाता है साथ ही उस क्षेत्र को सामूहिक रूप से इसके उत्पादन का एकाधिकार प्राप्त हो जाता है। लेकिन इसके लिए शर्त है की उस उत्पाद का उत्पादन या प्रोसेसिंग उसी क्षेत्र में होना चाहिए जहाँ के लिए गई टैग (GI Tag) लिया जाना है।
भौगोलिक संकेत न केवल हमारी समृद्ध संस्कृति और सामूहिक बौद्धिक विरासत का हिस्सा हैं बल्कि हमारे किसानों, बुनकरों, दस्तकारों, हस्तशिल्पियों की आय के साधन भी है। भारत सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के अनुरूप भौगोलिक संकेत का संवर्धन करना और इसकी सुरक्षा करना सरकार ने अपनी जिम्मेदारी समझी है।
Author: Amit Rajpoot
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