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सुरों के जादूगर मोहम्मद रफ़ी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सुर अज़ल तक इस क़ायनात में गूँजते रहेंगे। वो एक फ़रिश्तासफत गायक थे। लेकिन इसके बावजूद 31 जुलाई, 1980 की वो रात जब 10 बजकर 25 मिनट पर हिन्दी सिनेमा का एक ऐसा शख़्स जिसने न सिर्फ़ बॉलीवुड को बल्कि पूरे भारत सहित दुनिया के उन तामाम देशों में जो हिन्दी समझते हैं, उन सभी को हैरान कर दिया था और दुःख की गहरी खाई में लेकर मायूस कर दिया था, क्योंकि यही वह रात थी जब मो. रफ़ी इस दुनिया को छोड़कर चल बसे थे। आपको बता दें कि मोहम्मद रफ़ी की आज 39वीं पुण्यतिथि मनायी जा रही है।
आपको बता दें कि उस रात मो. रफ़ी को बड़े पैमाने पर दिल का दौरा पड़ गया था, जिसके बाद 55 साल की अवस्था में इन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए अपनी धड़कने थाम लीं। दिलचस्प है कि मो. रफी ने अपने करियर का आख़िरी गाना फिल्म आस पास के लिए गाया था। सूत्रों की मानें तो उनका कहना है कि गाना ‘शाम फिर क्यूं उदास है दोस्त...’ को उन्होंने उनकी मृत्यु से कुछ ही घंटे पहले रिकॉर्ड किया था। हालाँकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इसी फ़िल्म के गाने ‘शहर में चर्चा है...’ को उन्होंने अपनी मृत्यु के ठीक पहले गाया था।
ये बात भी ग़ौर करने लायक है कि मो. रफी को जब उनकी मौत के बाद जुहू स्थित मुस्लिम क़ब्रिस्तान में दफनाया गया था तो उनके अंतिम संस्कार में 10,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे। यह किसी की क़ब्र पर उमड़े भारत में सबसे बड़े जुलूसों में से एक था। ऐसे वक्त पर भारत सरकार ने उनके सम्मान में दो दिवसीय सार्वजनिक शोक की घोषणा की थी।
Author: Amit Rajpoot
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