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नानाजी देशमुख एक विराट व्यक्तित्व के धनी इंसान थे, जो अपने महान कार्यों की बदौलत देश की महान विभूति बन गये। समाज सेवा करते हुए नाना जी देशमुख ने एएकात्म मानववाद का रास्ता अपनाया और महाराष्ट्र के हिंगोली से लेकर उत्तर प्रदेश के चित्रकूट तक इन्होंने अपने पद चिन्हों की छाप छोड़ी, जिसकी रज पूरे भारतवर्ष की आबोहवा में घुली, जिसे समेकित रूप से महसूस किया गया।
उनके इन्हीं सराकारों के कारण उनकी मृत्यु के पूरे नौ बरस के बाद ही सही, लेकिन उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया है। आपको बता दें कि बृहस्पतिवार को राष्ट्रपति भवन में नाना जी देशमुख के सहयोगी रहे वीरेन्द्र जीत सिंह ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों से सम्मान ग्रहण किया।
ग़ौरतलब है कि साल 1980 में साठ साल की उम्र में उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर आदर्श की स्थापना की। बाद में नाना जी ने अपना पूरा जीवन सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगा दिया। वे आश्रमों में रहे और कभी अपना प्रचार नहीं किया। उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसमें रहकर समाज-सेवा की। उन्होंने चित्रकूट में चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो कि यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे इसके पहले कुलाधिपति भी रहे।
ये बात भी ग़ौर करने लायक है कि उन्होंने गरीबी निरोधक व न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाया, जिसके अन्तर्गत कृषि, कुटीर उद्योग, ग्रामीण स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा पर विशेष बल दिया। राजनीति से हटने के बाद नाना जी देशमुख ने संस्थान के अध्यक्ष का पद संभाला और संस्थान की बेहतरी में अपना सारा समय अर्पित कर दिया। उन्होंने संस्थान की ओर से रीडर्स डाइजेस्ट की तरह मंथन नाम की एक पत्रिका निकाली जिसका कई वर्षों तक केआर मलकानी ने सम्पादन किया।
क्या है भारत रत्नः
इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी, 1954 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। अन्य अलंकरणों के समान इस सम्मान को भी नाम के साथ पदवी के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। प्रारम्भ में इस सम्मान को मरणोपरांत देने का प्रावधान नहीं था, यह प्रावधान 1955 में बाद में जोड़ा गया।
Author: Amit Rajpoot
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