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भारत में अनेक संवत् होने के बाद भी यहाँ पश्चिम का गैगोरियन कैलेण्डर ही फॉलो होता जबकि भारतीय शक संवत्सर या संवत् के अनुसार हमारी कालगणना एकदम से भिन्न है। आपको बता दें कि हमारे यहाँ नववर्ष चैत शुक्ल पक्ष वर्ष प्रतिपदा को मनाया जाता है। इसके बाद इसी काल गणना के अनुसार ही हमारे सभी त्यौहार जौसे होली, दीपावली, वैशाखी, पोंगल, पहला वैशाख आदि दिवस को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लेकिन ये दुख की बात है कि आज भारतीय इतिहास को दो भाग ईसा पूर्व व ईसा सम्वत में बांट दिया गया है और इसी को वर्षांक के रुप में उपयोग किया जा रहा है, क्योंकि इतने सम्वत के मध्य अपनी गणना पद्धति खो गयी है। अर्थात् एक सम्वत के आधार पर ही हमें गणना करते हुए इतिहास का निर्माण करना चाहिए।
भारत के प्रचलित संवत्सरः
भारत के प्रचलित संवत्सरों की बात करें तो अब तक सृष्टि सम्वत, कलि सम्वत या युगाब्द, युधिष्ठिर सम्वत, विजय (महावीर) सम्वत, लोधी सम्वत, शालिवाहन सम्वत, गुप्त सम्वत, हिजरी सम्वत, मधा सम्वत, विक्रम सम्वत, शक सम्वत, नानक सम्वत, दयानन्द सम्वत, बंगला सम्वत और वीर निर्वाण संवत आदि कई सम्वत प्रचलन में हैं।
अब सोचने वाली बात है कि भारत में इतने सम्वतों के प्रचलन के उपरांत भी भारतीय जनमानस नववर्ष 1 जनवरी को एवम् काल-गणना ईसा सम्वत या गैगोरियन कैलेण्डर के आधार पर करते हुए अपने इतिहास की रचना कर रहा है।
Author: Amit Rajpoot
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