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जीवन में कभी भी कुछ थोड़ी सी परेशानी हमें हैरान कर देती है और कभी तरक़्क़ी की राह में आये ज़र से रोड़ों से हम घबरा जाते हैं और कभी कभी तो एकदम से टूट ही जाते हैं। ऐस में यक़ीनन हमें हौसला रखने की ज़रूरत ती है। लेकिन कभी-कभी ज़िन्दगी इतना हैरान और परेशान कर जाती है कि फिर उसको र कर पाना या उससे लड़ पाना हर किसी के बस की बात नहीं होती है। लेकिन हाँ, यदि समस्येँ बड़ी होती हैं, तो फिर उनसे लड़ने वाले बड़े लड़इया भी होते हैं। प्रीति श्रीनिवासन उन्हीं बड़े लड़इयाओं में से एक हैं।
आपको बता दें कि प्रीति श्रीनिवासन अंडर-19 तमिलनाडु क्रिकेट टीम की कप्तान रह चुकी हैं। इसके अलावा प्रीति श्रीनिवासन तैराकी में भी चैपियन रह चुकी हैं। उन्‍होंने तैराकी में 50 मीटर ब्रेस्‍ट स्‍ट्रोक में गोल्‍ड मेडल हासिल किया था। मगर 11 जुलाई, 1998 को प्रीति श्रीनिवासन की तक़दीर दगा दे गई। प्रीति की उम्र उस वक्त 18 साल थी।
वह क्लास के दोस्तों के साथ बीच पर धमाचौकड़ी कर रही थीं कि अचानक लहरों के बीच प्रीति ने करंट-सा महसूस किया। जब तक वह समझ पाती कि क्या हुआ, उनके शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। प्रीति को ख़तरनाक तरीक़े का पैरालिसिस हो गया था।
बहरहाल, पैरालिसिस ने प्रीति श्रीनिवासन के शरीर को चोटिल तो कर दिया है किया उनके इरादों को को ज़री भी न छू सका। लिहाज़ा प्रीति ने अपने मन को मज़बूत किया और उन्हों दूसरे दिव्यांगों और खिलाड़ियों को मदद करने के लिए 'सोलफ्री नाम की एक स्वंयसेवी संस्था बनाई। 'सोलफ्री' विकलांगों के आत्मविश्वास लौटाने और उनके टैलंट को पहचान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का काम करता है। यह लकवा के शिकार उन मरीजों को रिहाइश या आर्थिक मदद मुहैया कराता है, जो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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