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बुराई ज्यादा दिन टिक नहीं पाती है उसका नाश करने के लिए भगवान किसी ना किसी को बनाता ही है। इस सबके बारे कथा-पुराण के जरिये लोगों को बताया गया है। इस बार 23 से 24 तारीख तक लोग भगवान श्री कृष्ण का जन्मदिन मनाने वाले हैं। इसी के साथ ही भगवान श्री कृष्ण का जन्म भी बुराई पर अच्छाई की जीत का ही एक उदाहरण है।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं, क्योंकि इस दिन श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। इसी के साथ ही ये भी माना जाता है कि ये रात बहुत काली होती है। आधी काली रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। देवकी कंस की बहन थी। कंस ने गद्दी और सत्ता के लालच में आकर अपने पिता को गद्दी से उतार दिया और खुद मथुरा का राजा बन गया था।
द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज करते थे। इनके दो बच्चे थे कंस और देवकी। देवकी का विवाह वसुदेव नाम के एक यदुवंशी सरदार से हुई थी। एक दिन कंस अपनी बहन देवकी को बहुत प्रेम से उसकी ससुराल छोड़वने जा रहा था इसी समय एक आकाशवाणी हुई। इसमें कहा गया कि- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ।
अपने पति को बचाने के लिए देवकी ने विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?' बहन की ये बात सुनकर कंस वापस मथुरा लौट आया और अपनी बहन और अपने बेहनोई को कारागृह में डलवा दिया। एक के बाद एक देवकी और वासुदेव के संतान हुई और एक एक करके सातों संतानों को मार डाला।
जैसे ही उनको 8वीं संतान होने वाली थी काराग्रह में पहरा कड़ा कर दिया गया। इबस उस क्षण का इमतेजार जब देवकी के बच्चा हो और कंस उसकी हत्या कर दे। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। इन दोनों ने वासुदेव और देवकी के दुख को देख कर इनकी आठवीं संतान की रक्षा करने का सोचा। जिस समय देवकी के गर्भ से बेटे का जन्म हुआ उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक बेटी पैदा हुई जो केवल एक छाया थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।
इसके बाद भगवान ने बच्चे को और अपने रूप को बचाने का एक उपाय निकाला। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।'
उसी समय वासूदेव नवजात शिशु-रूपी बच्चे को एक सूप में रख कर यमुना पार करके यशोदा की गोद में रख आए और उनकी पुत्री को अपने साथ वापस लेकर आ गये। इसके बाद कारागृह का दरवाजा अपने आप ही बंद हो गया। अब कंस को इस बात की सूचना मिली की वासूदेव और देनकी के बच्चा पैदा हुआ है। इसके बाद कंस ने देवकी बच्ची को छीना और उसको जमीन पर पटखना चाहा मगर बच्ची आकाश में उड़ गयी और बोली- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।'
ये थी कृष्ण जन्म की कथा और इसके बाद कृष्ण ने किस तरह से दुनिया को कंस के प्रकोप बचाया हर कोई जानता है।
Anida Saifi
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