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गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर लोग उनको घर लेकर आते हैं। इसके बाद 10वें दिन उनकी मूर्ती को पानी में विसर्जित कर देते हैं। बता दें कि इस दौरान लोग काफी व्रत करते हैं। इस दौरान व्रत करने के साथ ही कथा भी सुनाई जाती है। बता दें कि इसके लिए कई कथाएं मिल जाती हैं। एक काफी प्रचलित कथा आज पढ़िये यहां पर। इसी के साथ जानिये किस तरह से अपन ख्याल रख सकते हैं आप।
इस तरह से हुआ था गणेश का जन्म...
एक बार महादेव माता पार्वती के साथ नर्मदा के तट पर गए। वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वतीजी ने महादेव के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। तब शिवजी ने कहा- हमारी हार-जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती ने तत्काल वहाँ की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से कौन जीता, कौन हारा?
यूं दिया माता पार्वती ने श्राप...
खेल आरंभ हुआ। दैवयोग से तीनों बार पार्वतीजी ही जीतीं। जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेवजी को विजयी बताया। परिणामतः पार्वतीजी ने क्रुद्ध होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का शाप दे दिया।
मां से मिलन के लिए रखा था व्रत
बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया है। मैंने किसी कुटिलता या द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा करें तथा शाप से मुक्ति का उपाय बताएँ। तब ममतारूपी माँ को उस पर दया आ गई और वे बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने आएँगी। उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं।
एक वर्ष बाद वहाँ श्रावण में नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं। नाग-कन्याओं ने गणेश व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई। तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्रीगणेशजी का व्रत किया। तब गणेशजी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो। बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुँच सकूं और वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ।
गणेशजी 'तथास्तु' कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया। शिवजी ने उससे वहाँ तक पहुँचने के साधन के बारे में पूछा।
तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी। उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं। तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह 21 दिन पर्यन्त श्रीगणेश का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई।
वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूँ। शिवजी ने 'गणेश व्रत' का इतिहास उनसे कह दिया।
तब पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया। 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वतीजी से आ मिले। उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया।
इस तरह से रखें अपना ख्याल
कई लोग एक दिन के लिए व्रत रखते हैं तो कई लोग पूरे 10 दिन कर व्रत करके पूजा अर्चना करते हैं। पूजा अर्चना करने के साथ ही व्रत करते वक्त अपना भी ख्याल रखना होता है। इसीलिए तले हुए या फिर ज्यादा तेल वाले खाने से परहेज करें। इसी के साथ ही रखें इन बातों का ख्याल भी।
सुबह का नाशता
व्रत के दौरान सुबह में अनानास, मौसम्बी, संतरे का जूस पीना ना भूलें। इसी के साथ ही पपिता भी खा सकते हैं। इसको पीने से शरीर में दिनभर एनर्जी रहती है।
फलाहार भोजन
सुबह 7-8 बजे के बीच आप फल खा सकते हैं। इसी के साथ ही फल आप ज्यादा खाएं। इसको खाने से आपका पेट देर तक ङरा रहेगा। इसके अलावा आप पनीर और सवां के चावल खा सकते हैं। इसको खाने से शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी होगी।
सबुदाना और कुट्टू का आटा
साबुदाने की खुचड़ी के साथ ही आप कुट्टू के आटे की रोटी या फिर परांठा खा सकते हैं। इसके साथ आप लौकी की सब्जी या फिर दही खा सकते हैं।
Anida Saifi
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