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गणेश चतुर्थी के मौके पर हर कोई अपने घर पर भगवान गणेश की प्रतिमा लाकर स्थापित कर रहा है, 11 दिन पूजा-पाठ के बाद गाजे-बाजे के साथ गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन नदी में किया जाएगा। तब-तक भगवान गणेश का सेवा-सतकार बड़े ही धूमधाम से घर पर किया जाता है। इस दौरान चौकी सजाई जाती है, लड्डुओं और मोदक का भोग लगाया जाता है, पूजा की थाली सजाई जाती है। पूजा की थाली से एक बात याद आई, जो भगवान गणेश की पूजा अराधना के दौरान हर किसी को ध्यान रखनी चाहिए। बात ये है कि भगवान गणेश की पूजा के दौरान आपको उन्हें तुलसी के पत्ते बिल्कुल नहीं चढ़ाने चाहिए।
यूं तो हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को बेहद पवित्र माना गया है, लेकिन एक मतभेद के कारण भागवान गणेश ने आदेश दिया था कि उनकी पूजा में कभी भी तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाये जाएंगे।
आइए जानते हैं क्या है वो मतभेद-
पौराणिक ग्रंथों में भगवान गणेश और तुलसी के बीच हुए इस मतभेद का जिक्र किया गया है। कहा जाता है कि एक बार माता तुलसी पति प्राप्ति की कामना लेकर भ्रमण पर निकली थी, भ्रमण के दौरान जैसे ही वह गंगा नदी के तट पर पहुंची उन्हें भगवान गणेश ध्यान मुद्रा में बैठे दिखे। वह उन्हें देखकर बेहद ही प्रभावित हो गई, उन्हें उनके चेहरे का तेज सूरज के समान लगा... उनका इतना मनमोहक रूप देखकर वह खुद को रोक नहीं पाईं और गणेश जी से अपने विवाह की बात कह डाली। तुलसी ने कहा, “हे देव! मैं उचित वर प्राप्ति की कामना लेकर बहुत दिनों से भटक रही हूं। आज आपके दर्शन होने पर लगा कि मेरी तपस्या पूरी हो गई है। आपका ये तेजस्वी रूप देख कर मैंने मन ही मन आपको अपना पति मान लिया है इसीलिए कृपा मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।”
ये सुनकर गणेश भगवान अचंभित रह गये और उन्होंने यह कहकर विवाह करने से मना कर दिया कि वह एक ब्रह्मचारी है और वो कभी विवाह नहीं करेंगे।
ये सुनकर तुलसी जी वहां से निकल गईं, रास्ते में उनकी मुलाकात देवर्षि नारद जी से हुई। नारद जी ने तुलसी जी से दुखी होने का कारण पूछा, तो तुलसी जी ने उन्हें सारी बात बताई। ये सुनते ही नारद हंस पड़े और उन्होंने कहा कि गणेश जी की लीला नहीं जानते हैं, पता नहीं किस कारण उन्होंने आप असत्य कहा वह कोई ब्रह्मचारी नहीं। उन्होंने शायद आपसे हंसी-ठिठोली में ये सब कहा होगा। ये कहकर वह वहां से निकल गये, वहीं ये सुनते ही तुलसी जी गुस्से में आग बबुला हो गईं।
वह गुस्से में गणेश जी के पास वापस गईं और उन्होंने श्राप देते हुए बोली कि आप विवाह से बचना चाहते थे न... अब आपका आपकी इच्छा के विरुद्ध विवाह होंगे वो भी 2। ये सुनते ही गणेश जी भी क्रोधित हो गये और उन्होंने भी तुलसी जी को श्राप दे डाला कि उनका एक राक्षस से विवाह होगा। ये सुनकर तुलसी जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गणेश भगवान से माफी मांग ली।
तब भगवान गणेश ने उन्हें कहा कि उनका श्राप अब वापस नहीं होगा, लेकिन उन्होंने तुलसी जी को वादा किया कि कलयुग में वह जीवन और मोक्ष देने वाली होंगी।
हालांकि, इस सब मतभेद के बाद से ही गणेश जी ने ये आदेश दिया कि उनकी पूजा में कभी तुलसी नहीं चढ़ाई जाएगी।
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