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भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं। इन दिनों हर किसी के घर में बप्पा विराजे हैं, जो कि कुल दस दिनों तक अपने सम्पूर्ण तेजमयी अवस्था में हमारे घर में वास करते हैं। इस प्रकार, कुल दस दिनों के प्रवास के बाद लोग उनकी मूर्ति का जलकुण्ड में विसर्जन कर देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है और यह भी कि भगवान गणेश किस तरह से इन दस दिनों में अपने सम्पूर्ण और उच्च तेज के सेवरूप में होते हैं। यदि नहीं, तो आज हम आपको इसके बारे में बताने जा रहे हैं।
श्रीमद् भागवत् महापुराण में उल्लेख है कि महर्षि वेदब्यास जी ने गणेश चतुर्थी से भागवत् रचना शुरू की। वे कथा सुनाते रहे और भगवान श्री गणेश उसे अपने एक दाँत को कलम बनाकर लिपिबद्ध करते रहे। दस दिनों बाद जब महर्षि वेद ब्यास ने अपनी कथा पूरी करने के पश्चात् अपनी आँखें खोली तो देखा कि गणेश जी का शरीर अचानक से गरम हो उठा है और तेज से बेहद चमक रहा है, जो कि दस दिनों के उनके अनथक श्रम का प्रतिफल था।
भगवान श्री गणेश जी के शरीर को इतना तेज में तपता हुआ देख महर्षि वेद ब्यास ने तत्काल भगवान गणेश को पास में ही स्थित एक जल कुण्ड में बैठाकर उनका ताप शान्त किया। कहते हैं कि तभी से स्थापना-पूजन के दस दिनों बाद भगवान गणेश जी की प्रतिमा के विसर्जन का उत्सव शुरू हुआ।
यह विसर्जन गणेश चतुर्थी के दस दिनों बाद चतुर्दशी की तिथि को किया जाता है, जिसे हम सभी अनन्त चतुर्दशी के पर्व के रूप में मनाते हैं। इस प्रकार, हम देखते हैं कि अनन्त चतुर्दशी की पर्व अनन्तता और सांसारिक नश्वरता का तत्व दर्शन है।
Author: Amit Rajpoot
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