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विकलांगता किसी भी स्तर की हो सकती है। जी हाँ, ये मानसिक और शारीरिक इन दोनों स्तर तो तो प्रमुकता से होती है। आपको बता दें कि आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में तो मानसिक स्तर के बीमार लोगों की भरमार है। हैरानी तो इस बात रकी है, कि इनमें से ज़्यादातर लोगों को इस बात का अंदेज़ा भी नहीं होता है। बहरहाल, माना कि आज लोगों की दिनचर्या ही ऐसी हो गयी है, जिसमें वह योग और अन्य तरह के ध्यान आदि को ज़्यादा समय नहीं दे सकते हैं। लेकिन इसके बाद यह तय है कि यदि लोगों को अपनी विकलांगता समाप्त करनी है तो इन्हें कम से कम मुद्रा के विज्ञान का सहारा ज़रूर लेना होगा और यह आकाशमुद्रा के सहारे पूरी भी हो जाती है।
आकाशमुद्रा को समझने से पहले आप सबसे पहले यह समझ लें कि यह एक ऐसी मुद्रा है जिससे हम अपने शरीर के के आकाश तत्वों को नियंत्रित करते हैं और उन्हें दुरुस्त करते हैं। जी हाँ, आपको बता दें कि हमारे शरीर में उपस्थित आकाश तत्व के विस्तार से शून्यता, ख़ालीपन, निरर्तकता और अकेलापन दूर होता है। इसलिए आकाशमुद्रा मानसिक और शारीरिक विकलांगों के लिए योग द्वारा दिया गया एक बहुत ही अमूल्य उपहार है। आपको बता दें कि लम्बे वक़्त तक आकाशमुद्रा का अभ्यास करते रहने से कान बहने, बहरेपन तथा कानों में झनझनाहट की परेशानी दूर होती है।
कफ़ दोष, गले में खराश और जबड़े की जकड़न भी आकाशमुद्रा से ख़त्म हो जाती है। ये बात भी ग़ौर करने लायक है कि ऑस्टियोपोरोसिस, हृदय रोग और उच्च रक्त चाप में भी आकाशमुद्रा के ग़ज़ब के फ़ायदे मिलते हैं।
ये जानना भी काफी दिलचस्प है कि बाएँ हाथ से आकाशमुद्रा बनाकर भोजन किया जाये तो अन्न गले में नहीं फँसता। इसके लिए अंगूठे और मध्यमा के शीर्ष को आपस में मिलाएँ। इसके अलावा शेष उँगलियों को एकदम से सीधा रखें। इस आकाशमुद्रा का अभ्यास रोज़ाना 45 मिनट तक कर सकते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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