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आवाज़ में स्पन्दन उसके होने का पहला प्रमाण है। इसलिए आवाज़ के होने का प्रमाण स्पन्दन जब नदारत होता है तो कई बार आवाज़ के उपयोगी होने अथवा न होने की बात स्पष्ट होती है। इसलिए यहाँ आवाज़ के होने का आशय हम आवाज़ के स्पन्दन को महसूस कर पाने को समझ रहे हैं। ऐसे में आवाज़ के होने का सीधा सा मतलब है कि स्पन्दन पैदा कर दिया जाये। इस सिद्धान्त को अब आप भौतिक विज्ञान से लेकर जीवन के विज्ञान तक समझ सकते हैं और इस्तेमाल भी कर सकते हैं।
मतलब साफ़ है कि आप का कहा अथवा आपका किया हुआ समाज में स्पन्दन पैदा कर दे वही आवाज़ है अन्यथा फिर सरोकारों से परे आवाज़ का होना वैसा ही है, जैसे निम्न आवृत्ति की ध्वनि का अनुपयोगी होगा। अंततः स्पष्ट है कि आवाज़ वही है, जिससे धमक पैदा हो। धमक से हमें एक बात और भी स्पष्ट होती है कि फिर इसकी आवृत्ति का परास यानी कि दायरे का प्रश्न आयेगा, जिसका हम सामुदायिक विभाजन कर सकते हैं।
अब इन समुदायों के आधार पर ही आप किसी आवाज़ की ज़रूरत और उसकी फ्रिकवेंसी का अंदाज़ा लगा सकते हैं। अब यदि आप अपने काम और उसके प्रभाव से उस अमुख समुदाय में स्पन्दन पैदा कर जाते हैं तो फिर आप उस समुदाय की आवाज़ कहलाएँगे। इसलिए हर किसी को चाहिए कि वह अपनी और फिर बाद में अपने समुदाय की आवाज़ बनें। इससे अपना विकास तो होता ही होता है बल्कि साथ में पूरे समाज का भी समेकित विकास होता चला जाता है।
Author: Amit Rajpoot
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