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अनंत चतुर्दशी का पर्व भादों के महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। सामान्य रूप से अनंत चतुर्दशी गणेश चतुर्थी के 10 दिन बाद आती है। यह भगवान विष्णु की अनन्त स्वरूप की आराधना का पर्व होता है। आपको बता दें कि अनंत चतुर्दशी का पर्व जैन और हिन्दुओं की संयुक्त आस्था का संगम है। इसलिए इसे हिन्दुओं में और जैनियों दोनों में ख़ूब धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान सत्यनारायण की कथा भी सुनते हैं। इस दिन श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करना बहुत उत्तम माना जाता है। भगवान गणेश के विसर्जन का भी दिन आआज ही होता है।
ग़ौरतलब है कि अनंत चतुर्दशी के उत्सव का दिन जैन कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण दिन होता है। जैन धर्म के दिगंबर जैनी लोग भादो माह के अंतिम 10 दिनों में अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस के रूप में मनाते हैं। यह पर्युषण का अंतिम दिन होता है। ये बात भी ग़ौर करने लायक है कि जैन लोग इसे क्षमावनी भी कहते हैं क्योंकि इस दिन जैन अपनी हरेक ग़लती के लिए ईस्वर से क्षमा माँगते हैं। जैनियों में अनंत चतुर्दशी वह दिन है जब भगवान वासुपूज्य वर्तमान ब्रह्मांड चक्र के 12वें तीर्थंकर निर्वाण को प्राप्त हुए।
बात करें हिन्दुओं के मन्यताओं की तो यह त्यौहार क्षीरसागर और भगवान विष्णु के अनंत रूप से जुड़ा हुआ है। इस दिन लकड़ी के तख़्त पर सिंदूर की चौदह छोटी खड़ी पट्टियाँ बनाई जाती हैं। चौदह तली हुई गेहूं की पूरियाँ और 14 गहरी तली हुई मीठी गेहूं के पुए सिंदूर की इन्ही पट्टियों पर रखी जाती हैं। क्षीरसागर के प्रतीक दूध, दही, गुड़, शहद और घी से बने पंचामृत को इस लकड़ी के तख्त पर रखा जाता है। 14 गांठों वाला एक धागा, जो भगवान अनंत का प्रतीक है, उसे एक ककड़ी पर लपेटा जाता है और इस पंचामृत में पांच बार घुमाया जाता है।
इसके बाद में यह अनंत धागा पुरुषों द्वारा कोहनी के ऊपर दाहिने हाथ पर बांधा जाता है। महिलाएँ इसे अपनी बाईं बाँह पर बाँध लेती हैं। यह अनंत धागा 14 दिनों के बाद हटा दिया जाता है। मान्‍यता है कि इस दिन हर चीज़ 14-14 रखने के पीछे का विधान इसलिए है क्योंकि भगवान के 14 लोक सत्‍य, तप, जन, मह, स्‍वर्ग, भुव:, भू, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल हैं और ये उन्ही के प्रतीक होते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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