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जहाँ एक ओर उत्तर भारत के मैदानी इलाक़ों में लोग वनों की अंधाधुंध कटाई में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी हरीतिमा के लिए जाने जाने वाले पूर्वोत्तर के एक इलाक़े की एक छोटी सी पहाड़ी रूखी क्या हुआ मोइरांगथेम लोइया का कलेजा फट गया। जी हाँ, पर्यावरण के प्रति हमारा स्नेह ऐसा ही होना चाहिए और गम्भीरता भी क्योंकि हमारे भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51-ए(जी) यह साफ-साफ कहता है कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह वन, झील, नदियों और जीवों की रक्षा करे और मणिपुर के मोइरांगथेम लोइया इस बात को बेहद सीरियसली लेते हैं बाक़ी के लोग तो बेहोशी में जी रहे हैं।
आपको बता दें कि 45 साल के मोइरांगथेम लोइया मणिपुर के पश्चिमी इंफाल के उरीपोक खैदेन गाँव के रहने वाले हैं। ये एक दिन ये मणिपुर की लेंगोल पहाड़ी पर उसके वनक्षेत्र पुनशिलोक की तरफ घूमने निकले। पुनशिलोक को देखकर ये बेहद हैरान हुए कि जब ये अपने बचपन में यहाँ आये थे तो यह हरीतिमा का एक जीता-जागता ग़ुलदस्ता था लेकिन अब उन्हें पता चला कि स्थानीय लोगों ने धान की खेती के लिए पुनशिलोक की भूमि को यूज़ में लेने के लिए वहाँ के पेड़-पौधों को जला दिया है। पेड़ काट दिये जाने के लिए पुनशिलोक पूरी तरह से बंजर और वीरान हो गया था, जिसे देख मोइरांगथेम बहुत ज़्यादा व्यथित हो गये।
मोइरांगथेम ने उसी वक़्त ठान लिया कि वह पुनशिलोक की काया को फिर से पहले जैसा ख़ूबसूरत बनाएँ और इसके लिए वह अपनी नौकरी छोड़कर वहीं पुनशिलोक में एक झोपड़ी बनाकर रहने लगे। इस तरह पुनशिलोक में उनके साल-दर-साल छह वर्ष गुजर गए। इस बीच वह अकेले ही जुनून में वहाँ मगोलिया, ओक, बांस, टीक, फिकस आदि के बीज खरीद लाए। उन्हे ज़मीन बो दिया। तैयार होने के बाद उनके पौधे रोपने लगे।
इसके बाद वर्ष 2003 में लोइया और उनके साथियों ने वाइल्डलाइफ ऐंड हैबिटैट प्रोटेक्शन सोसायटी (डब्ल्यूएएचपीएस) बनाई। इस संस्था के वॉलंटियर्स भी वन लगाने और उसे संरक्षित करने के काम में लग गए। इस तरह से कुल 18 सालों में मोइरांगथेम लोइया ने अपने साथियों की मदद से पुनशिलोक सहित लेंगोल पहाड़ी के अन्य क्षेत्रों में 300 एकड़ का जंगल तैयार कर दिया है।
अब यहाँ जीव और पौधों की बहुत सारी प्रजातियां पाई जाती हैं। 250 अलग-अलग तरह के पौधों में कई आयुर्वेदिक औषधियां भी हैं। इसके अलावा साँप, भालू, तेंदुआ, साही और कई अन्य जानवर भी यहाँ पाए जाते हैं। जानवरों के अलावा पुनशिलोक जंगल पक्षियों का भी घर है।
Author: Amit Rajpoot
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