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कितनी अजीब बात है न...कितनी धूमधाम से हम गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की मुर्ति अपने घर लेकर आते हैं, एक बच्चे की तरह उनका ध्यान रखते हैं उनका लालन-पालन करते हैं। लेकिन फिर इसके बाद हम उन्हीं बप्पा की मूर्ति पानी में जाकर विसर्जित कर देते हैं! क्या आपके दिमाग में कभी ये सवाल नहीं उठा... कि क्यों? आखिर ऐसा क्यों किया जा है।
कुछ लोग 1 दिन कुछ 3, 5, 7 और 10 दिन के बाद गणेश भगवान का विसर्जन करते हैं। गणेश चतुर्थी के 10वें दिन यानी अनंत चतुदर्शी के दिन नम आंखों से हम बप्पा को विदा कर देते हैं।
आइए जानते हैं बप्पा के विसर्जन से संबंधित इस रहस्य के बारे में-
पुराणों के अनुसार जब वेदव्यास जी गणेश भगवान से महाभारत लिखवा रहे थे, तब भगवान गणेश ने उनसे एक वादा लिया था। वादा ये था कि वह तब तक महाभारत की कहानी बोलते रहेंगे, और खुद भगवान गणेश भी महाभारत को तब-तक लिखते रहेंगे जब-तक वो खत्म नहीं हो जाती। इस वादे के साथ वेदव्यास ने निरंतर महाभारत भगवान गणेश को सुनाई वह निरंतर 10 दिनों तक उसे लिखते रहे। 10वें दिन जब महाभारत खत्म हो गई, तब वेदव्यास जी ने देखा कि भगवान गणेश के शरीर का तापमान बेहद ही बढ़ा हुआ था। उनके तपते शरीर को देखते ही वेदव्यास जी ने तुरंत उन्हें पास की नदी में डुबकी लगवा दी। ताकि उनके शरीर का तापमान कम हो जाये और उनका स्वास्थ्य ठीक रहे।
इसी वजह से लोग गणेश चतुर्थी के दिन बप्पा की मुर्ति अपने घर सजाते हैं और 10 दिनों तक उनकी पूजा अराधना करते हैं। इस दौरान हर कोई अपनी-अपनी मनोकामना बप्पा के कान में बोलते हैं ताकि वह पूरी हो जाये। इस वजह से कहा जाता है कि इतनी मनोकामनाओं को सुनकर बप्पा का तापमान काफी बढ़ जाता है, इसी तापमान को कम करने के लिए उन्हें पानी में विसर्जित किया जाता है।
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