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उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले स्थित हिमालय पर्वत की चोटियों के बीच 16499 फीट की ऊंचाई पर स्थित है ये रहस्यमयी ‘रूपकुंड’ झील। हिमालय की गोद में स्थित ये झील अपने कम तापमान की वजह से ज्यादातर जमी रहती है। लेकिन साल के सबसे गर्म महीने में ये झील पिघलती है, तो जो नजरा देखने को मिलता है उसे देखकर अच्छे-अच्छों के हिमालय में ही पसीने छूट जाते हैं। भले ही इस झील का नाम ‘रूपकुंड’ हो, लेकिन रूपकुंड का अर्थ यहां किसी रूपवती या खूबसूरत स्त्री से दूर-दूर तक नहीं है। बल्कि इस झील के पीछे छुपा रहस्य आपको डराने का काम करता है। इस झील का नाम ‘रूपकुंड’ है, लेकिन लोग इसे ‘कंकाल झील’ भी कहते हैं क्योंकि इस झील में आपको खूबसूरत रंग-बिरंगी मछलियों की जगह नर-कंकाल तैरते नजर आएंगे।
साल के सबसे गर्म महीने में जब ये झील पिघलती है, तो इसमें दिखाई देते हैं नर कंकाल। वो भी एक दो नहीं बल्कि 500 से अधिक नरकंकाल।
इस वजह से ‘रूपकुंड झील’ का ये सबसे बड़ा रहस्य बन जाता है कि आखिर हिमालय की गोद के इस विरान जगह पर ये नरकंकाल आए कहां से? और इतने सारे लोगों की मौत आखिर हुई कैसे?
साल 1942 में ब्रिटिश फॉरेस्ट गार्ड ने इन नरकंकालों को सबसे पहले देखा था। पहले माना गया कि ये कंकाल उन जापानी सैनिकों के थे जो द्विती विश्व युद्ध के दौरान इस रास्ते से निकले थे। लेकिन बाद में पता चला कि ये कंकाल 12 सौ साल पुराने हैं।
ये 500 नरकंकाल कौन थे? और क्यों हिमालय की वादियों में गये थे? और इनकी मौत कैसे हुई... ये सभी आज-तक एक गहरा रहस्य बना हुआ है।
हैदराबाद, पुणे और लंदन के वैज्ञानिकों ने शोध करके पता लगाया कि इन कंकालों की मौत ओलों से हुई है। एक बड़ी गेंद के बराबर ओले तेज रफ्तार और भारत इनके ऊपर गिरे थे जिसकी वजह से इनके सिर की हड्डियों में दरारे पाई गईं है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इन कंकालों के सिर के अलावा शरीर के किसी हर हड्डी पर और कोई चोट के निशान नहीं है। खराब मौसम में बर्फ के गोले अगर सिर पर गिरे हैं, तो किसी के शरीर के दूसरे हिस्से पर भी जरूर गिरने चाहिए थे... लेकिन ऐसा नहीं है।
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