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पितृपक्ष चल रहा है। इस पखवारे में एएक विशेष काम यह किया जाता है कि कौओं को खीर खिलाया जाता है और शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में कौओं को खीर खिलने से वह पूर्वजों को मिल जाता है। आज के लोग इसे देखकर सोच रहे होंगे कि क्या हमारे ऋषि मुनि पागल थे, जो कौओं के लिए खीर बनाने को कहते थे। नहीं, हमारे ऋषि मुनि क्रांतिकारी विचारों के थे।आपको बता दें कि पितर पक्ष में या श्राद्ध के समय कौओं को खीर खिलाये जाने का अपना विज्ञान है, जिसे आज हम आपके साथ साझा करेंगे।
इसे समझने के लिए हमें बताइए कि कया तुमने किसी भी दिन पीपल और बड़ या बरगद के पौधे लगाए हैं? किसी को लगाते हुए देखा है? क्या पीपल या बड़ के बीज मिलते हैं? इन सबका जवाब है नहीं...। मालूम हो कि बड़ या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु नहीं लगेगी। कारण है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है। इन दोनों वृक्षों के टेटे कौए खाते हैं और उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं। उसके पश्चात कौए जहां-जहां बीट करते हैं वहाँ-वहाँ पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं।
आपको बता दें कि पीपल दुनिया का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है। ऐसे में अगर इन दोनों वृक्षों को उगाना है तो बिना कौओं की मदद से संभव नहीं है। इसलिए कौओं को बचाना पड़ेगा। इसके लिए हमारे ऋषियों-मुनियों ने बहुत ही उत्तम व्यवस्था करके रखी है।
दरअसल, मादा कौआ भाद्रपद महीने में अंडे देती है और अश्विन लगते ही उसका नवजात बच्चा अंडे सा बाहर आ जाता है। तो कौओं की इस नयी पीढ़ी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना ज़रूरी है। इसलिए ऋषि-मुनियों ने कौओं के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राद्ध के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी, जिससे कि कौओं की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये।
Author: Amit Rajpoot
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