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अब तक आपने इस कहावत को सिर्फ़ सुना होगा कि कुछ लोग फर्श से उठकर अर्श तक पहुँच जाते हैं। लेकिन नारायण ठाकुर इसके एकदम से ताज़े और चटख उदाहरण हैं। जी हाँ, आपको बता दें कि कभी भी कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता है कि कोई ऐसा बंदा जो कभी दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (डीटीसी) की बसों में पोछा मारता रहा हो और झाड़ू लगाता रहा हो वह एक दिन एशियन म्स का मेडल ले आयेगा या फिर ये कि जो कभी अनाथालय में रहा हो और रेहड़ी लगाता रहा हो वह भी ऊपर से उसका शरीर दिवयांग हो और अलग से ग़रीबी का मार। बावजूद इसके वह स्वर्ण पदक विजेता बन जाये। वास्तव में नारायण ठाकुर यही हैं।
आपको बता दें कि नारायण ठाकुर अनाथ आश्रम से निकल डीटीसी बसों में सफाई करते हुए और रेहड़ी लगाते हुए जकार्ता पैरा एशियाड में गोल्ड जीतने वाले शख़्स हैं। नारायण ठाकुर मूलतः बिहार के रहने वाले हैं। उनके पिता दिल के मरीज़ थे इसलिए इलाज के लिए वो दिल्ली चले आए थे। पिता की मौत के बाद उनकी मां के लिए तीन बच्चों को पालना काफी मुश्किल हो गया जिसकी वजह से उन्होंने नारायण ठाकुर को दरियागंज के एक अनाथालय में दाखिल करा दिया। यहां बस इतनी सहूलियत थी कि ठाकुर को दो वक्त का खाना और पढ़ने को मिल जाता था।
ग़ौरतलब है कि नारायण के शरीर का बाँया हिस्सा 'हेमी पैरेसिस' बीमारी से ग्रस्त है। ये एक ऐसी बीमारी है जिसमें दिमाग़ में स्ट्रोक लगने के कारण शरीर का एक हिस्सा लकवा ग्रस्त हो जाता है। पर नारायण ने विषम परिस्थितियों और शारीरिक अक्षमताओं को कभी भी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
ये बात जानना भी ज़रूरी है कि साल 2010 में जब ठाकुर ने अनाथ आश्रम छोड़ा तो उनके परिवार को एक और मुसीबत का सामना करना पड़ा, क्योंकि समयपुर बादली की जिन झुग्गियों में वह रहते थे, उन्हें ढहा दिया गया था। ऐसे में उन्हें उसके करीब ही शिफ्ट होना पड़ा।
नारायण के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे, ऐसे में उनके पास डीटीसी की बसें साफ करने और सड़क किनारे छोटे ठेलों पर काम करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं था, लेकिन खेल को लेकर उनका जज्बा इसके बाद भी क़ायम रहा जिसका परिणाम है कि आज उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज़ हो गया है।
Author: Amit Rajpoot
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