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रामबाबू तिवारी रहने वाले हैं उत्तर प्रदेश के जनपद बाँदा के और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते रहे हैं। यहाँ इन्होंने देखा कि लड़के जो कि हॉस्टल्स में रहते हैं शॉवर से नहाने में ढेर सारा पानी बर्बाद कर देते हैं और ऐसे ही जहाँ पर कपड़े धुलते हैं या फिर नहाते हैं और बर्तन धुलते हैं वहाँ भी नल ख़ुला छोड़कर चले आते हैं। सबसे ज़्यादा पानी तो शौच के लिए बर्बाद किया जाता रहा यहाँ। ये सभी बातें रामबाबू तिवारी का मन कुचेटती रहीं।
चूँकि रामबाबू तिवारी बुंदेलखण्ड के इलाक़े से आते हैं, इसलिए उन्होंने पानी के महत्व को हमेशा से ही समझा है और ये चाहते हैं कि सोग भी पानी की महत्ता को समझें। यूँ तो ऐसा रामबाबू तिवारी हमेशा से ही सोचते रहे हैं, लेकिन एक घटना ने इन्हें कुछ करने पर मज़बूर कर दिया।
जी हाँ, आपको बता दें कि इसी दौरान मैं मध्यप्रदेश के पन्ना में स्थित रामबाबू तिवारी अपनी भाभी के मायके में एक दाह-संस्कार में शामिल होने के लिए गये। वह मई का महीना था, वहाँ दाह-संस्कार के बाद स्नान के लिए इन्हें तक़रीबन दो किलोमीटर तक पैदल चलकर जाना पड़ा, तब जाकर नहाने का पानी मिला।
ऐसे में रामबाबू को अपने हॉस्टल में जल की बर्बादी का ख़्याल आया और उसके बरक्स उन्हें अपने सामने की स्थिति भी दिखती रही। इसके चलते रामबाबू के जीवन का लक्ष्य बदल गया, इनहोंने सोच लिया कि अब इन्हें जल संरक्षण की दिशा में ही काम करना है और तब से ये पानी के प्रबल पहरेदार बन गये हैं।
दिलचस्प है कि विश्वविद्यालय में वापस आने के बाद रामबाबू ने कुछ अपने वरिष्ठ अंतःवासियों और अन्य छात्रों को इकट्ठा किया और जल की बर्बादी रोकने के लिए हॉस्टल में टोंटियाँ सही करवाने और शॉवर की जगह मग व बाल्टी से नहाने का संकल्प लिया। शुरुआत में तकरीबन दस बच्चों ने इनका साथ दिया। लेकिन बाद में रामबाबू की बातें सभी को समझ में आने लगीं और लोग इनके साथ जुड़ते चले जाये। आपको बता दें कि अब रामबाबू सूख चुके कुओं को पुनर्जीवित करने के बारे में विचार कर रहे हैं।
Author: Amit Rajpoot
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