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नवरात्रि के छठे दिन मां देवी कत्यायानी की पूजा अराधना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित होता है। सच्चे मन से मां की पूजा करने से अविवाहित लड़कियों को मन वांछित वर की प्राप्ति होती है। इसके अलावा आपकी अन्य मनोकामनाएं भी पूरी होती है। इसके अलावा जिनकी कुंडली में बृहस्पति कमजोर होता है, उन्हें भी आज के लिए सच्चे मन से मां की स्तृति करनी चाहिए। इससे उनके सारे कष्ट दूर होते हैं।
मां कात्यायानी की उत्पत्ति को लेकर प्रचलित हैं ये कथाएं-
कहा जाता है एक कत नामक महर्षि थे, उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम ‘कात्य’ रखा गया। इन्हीं कात्य के गोत्र में कात्यायान ने जन्म लिया, जो आगे चलकर एक बड़े महर्षि बनें। कात्यायान ने एक पुत्री की चाह में देवी ‘भगवती पराम्बा’ की कई सालों तक कठोर तपस्या की, जिससे खुश होकर एक दिन देवी ने उन्हें अपने दर्शन दिये। देवी ने उनसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा, तो इसपर कात्यायन ने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि देवी मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली और कुछ समय बाद उनके घर पुत्री के रूप में जन्म ले लिया। इसी के बाद उनका नाम कात्यायानी पड़ा और आगे चलकर उन्होंने महिलाषुर नाम दानव का वध किया।
इसके अलावा एक और कथा प्रचलित है, जिसमें माना जाता है-
जब पृथ्वी पर दानव महिषासुर का अत्याचार बढ़ने लगा, हर तरफ उसी का हाहाकार होने लगा। तब उसके वध के लिए भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इन देवी की पूजा अराधनी की थी, इस वजह से भी इनका नाम कात्यायानी देवी पड़ा।
महिषासुर का वध करने के कारण इन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से भी जाना जाता है।
मां की उपासना से मिलता है मनचाहा वर-
जी हां, कहा जाता है कि भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियां कालिन्दी-यमुना के तट पर मां कात्यायानी की ही पूजा अराधना की थी। वे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
इस मंत्र का करें जप
ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥
इन सब के अलावा सच्चे मन से मां की स्तृति करने से रोग, शोक, डर व पापों से मुक्ति मिलती है।
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