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बुराई पर अच्छाई की जीत का दिन है ‘दशहरा’। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध करके ये साबित किया था कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो एक न एक दिन उसका अंत जरूर होता है। यही नहीं इस दिन को ‘विजयादशमी’ के नाम से भी जाना जाता है, देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एंव दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर का वध कर विजय हासिल की थी। इस वजह से आज के दिन को सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। आज के दिन हम भले ही रावण का पुतला जलाकर कह देते हैं कि बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई, लेकिन असल में हर इंसान के अंदर एक रावण और महिषासुर वास करता है... उस रावण का वध कौन करेगा?
अपने अंदर छुपे रावण व महिषासुर का वध करने के लिए आपको ही राम व दुर्गा बनना पड़ेगा।
हमारे अंदर रावण व महिषासुर के रूप में 5 बुराईयां वास करती है, जिनका वध हमें ही खुद करना पड़ेगा।
वो 5 बुराईयां है-
काम
मन को सारे अनर्थो की जड़ माना गया है, जिसने इस मन पर विजय पा ली उसने इस संसार पर विजय पा ली समान है। काम से अभिप्राय भौतिक इच्छा से हैं, हालांकि ईमानदारी से अपने अधिकार के अधीन इच्छा पूर्ति गलत नहीं होती और हर मनुष्य की कोई न कोई इच्छा होती है। लेकिन यह काम जब किसी मनुष्य में लैंगिक वासना, समाजिक प्रतिष्ठा व बिना मेहनत किये फल की इच्छा जैसी कामनाओं में परिवर्तिति हो जाये तो ये बहुत ही खतरनाक हो जाता है। समय रहते हमे इस बुराई को खुद से अलग कर देना चाहिए।
क्रोध
क्रोध बने काम बिगाड़ने में समय नहीं लगाता, इसलिए बड़े-बड़े लोग अक्सर अपने क्रोध के आगे हार जाते हैं। जो लोग अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते वह अपने सुखमय जीवन में समस्याओं को दावत देने का काम करते हैं। क्रोध समाजिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से आपको कमजोर बनाने का काम करता है। क्रोध किसी चीज का हल नहीं है, इसलिए अपने क्रोध पर काबू पाना क्रोध का वध करना भी बेहद जरूरी है।
मोह
मोह दुख को न्यौता देता है। किसी चीज से मोह लगाना और फिर उसका चला जाना हमें अंदर से दुखी कर देता है। दुखी मन हमें अपने उद्देश्य की पूर्ति पर ध्यान केंद्रित नहीं करने देता और हमारा जीवन ही एक उद्देश्य है जिसे हमे पाना है। किसी को संतान मोह होता है, किसी को धन मोह, तो कोई सुंदरता के मोह में फंसा रहता है। हमें इन सब चीजों से ऊपर उठकर अपने जीवन का आनंद लेना चाहिए।
लोभ
लोभ यानी लालच... अक्सर लालच के फंदे में फंसकर इंसान अपना सब कुछ खो बैठता है। इस संसार में जितने भी पाप होते हैं, वह सब लोभ के कारण ही होते हैं। लोभ के चक्कर में अच्छे-अच्छे फंस चुके हैं, रावण ने भी सीता माता के लोभ में आकर अपने प्राण गंवा दिये थे।
अंहकार
अहंकार की उत्पत्ति ही ‘अहम’ से हुई है। जिस इंसान के अंदर अहंकार वास करता है, वो इंसान सफल होकर भी हमेशा असफल रहता है। न कोई उसका सम्मान करता है और न उसकी सफलता में खुश होता है। रावण को भी अपने बल और बुद्धि का अहंकार था, लेकिन अंत की कहानी हर कोई जानता है। अगर आपके अंदर भी रावण जैसा अहंकार है तुरंत इसे खत्म कर दीजिए... वरना अहंकार का फल क्या होता है ये हर कोई जानता है।
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