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घर की कोई पूजा हो या फिर मंदिर की... धार्मिक अनुष्ठान हो या फिर कोई भी समान्य पूजा-पाठ.... हिंदू धर्म में कलावे का एक अलग ही महत्व होता है। जिसे पंडित जी कुछ मंत्रो उच्चारण के दौरान हाथ की कलाई पर बांधते हैं। कहा जाता है कि बिना कलावा बांधे कोई भी शुभ कार्य अधूरा माना जाता है। आपने भी कई बार अपने हाथ की कलाई पर कलावा जरूर बंधवाया होगा, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है हाथ पर बांधे जाने वाले कलावे का रंग अलग-अलग क्यों होता है?
इसमें आपने लाल रंग के कलावे देखे होंगे, गहरे लाल रंग के कलावे देखे होंगे, तो कभी आपने पीले रंग का कलावा बंधवाया होगा... इन कलावों रंग ही नहीं बल्कि इन्हें बांधने के पीछे का महत्व भी अलग होता है।
आइए जानते हैं कलावे के अलग-अलग रंग का क्या होता है महत्व-
लाल रंग का धागा
वेदों की मानें तो जब वृत्रासुर से युद्ध के लिए भगवान इंद्र जा रहे थे तो तब इंद्राणी ने भगवान इंद्र की भुजाओं पर लाल रंग का कलावा रक्षासूत्र के रूप में बांधा था। ताकि वह युद्ध में विजयी रहे, तब से लाल रंग का धागा बांधने की परंपरा चल रही है। ये लाल रंग का धागा रक्षासूत्र व मंगलकारी माना जाता है।
पीले रंग का धागा
पीला रंग शुद्धता का प्रतीक है, जिसे व्यक्ति में आत्मविश्वास और एकाग्रता बढ़ाने के लिए बांधा जाता है। पीला धागा ज्यादातर विवाह व गृह प्रवेश जैसे कामों के दौरान बांधा जाता है।
काले रंग का धागा
काला धागा बुरी नजर से बचाने के लिए बांधा जाता है, ये धागा ज्यादातर बच्चों और उन लोगों को बांधा जाता है जो ज्यादातर बीमार व मुसिबत में घिरे रहते हैं।
सफेद रंग का धागा
सफेद धागे को जनेऊ कहा जाता है, जो हाथ में न बांधकर बल्कि बाएं कंधे से दाएं कमर की तरफ पहना जाता है। इसे पवित्र सूत्र कहा जाता है... जोकि सफेद रंग के तीन धागों से बना होता है। इसमें तीन धागों को ब्रह्मा, विष्णु व शिव का रूप मना गया है।
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