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आज गुरु नानक जयंती है, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी के जन्मदिन के अवसर पर ‘गुरु नानक जयंती’ मनाई जाती है। इस दिन सिख समुदाय के लोग गुरुद्वारे जाकर नानक जी का नाम जपते हैं और उन्हें याद करते हैं। वहीं शाम के वक्त गुरुद्वारे में सेवा कर ‘लंगर’ खिलाने की भी प्रथा है। लंगर एक अद्भुत परंपरा है, जिसमें एक-साथ हजारों लोगों का पेट भरा जाता है, अगर आप भी कभी गुरुद्वारे गये होंगे तो आपने भी लंगर में प्रसाद जरूर ग्रहण किया होगा।
लेकिन, क्या आपके जहन में कभी ये सवाल आया कि आखिर ये लंगर की शुरुआत किसने और कब की थी?
आज गुरु नानक देव की के जन्मोत्सव के अवसर पर हम आपको बताते हैं कि इस ‘लंगर’ की शुरुआत करने वाले खुद गुरु नानक देव जी ही हैं। 15वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी ने ही लंगर प्रथा की शुरुआत की थी। गुरु नानक देव जी के द्वारा शुरु हुई लंगर प्रथा अपने आप में ही एक क्रांतिकारी कदम था। क्योंकि जिस वक्त लंगर की शुरुआत हुई उस वक्त समाज में ऊंच-नीच, छुआछूत जैसी बुराइयां काफी फैल चुकी थी। वहीं, लंगर प्रथा इसके विपरित थी... लंगर में हर समुदाय, हर जाति, हर धर्म के लोगों को साथ बैठाकर खाना खिलाने की एक कोशिश थी।
गुरु नानक जी बचपन से ही ऊंच-नीच के खिलाफ थे। व सभी धर्मों और जाति के लोगों को समान मानते थे। एक बार गुरु नानक जी के पिता ने उन्हें 20 रूपये देकर बाजार भेजा और उससे कारोबार करके मुनाफा घर लाने को कहा। नानक जी उन पैसों को लेकर बाजार निकल गये, रास्ते में उन्हें एक भिखारी मिला जो बहुत भूखा था। नानक जी से उसकी भूख बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने उन पैसों से उस भिखारी को खाना खिला दिया। फिर क्या नानक जी खाली हाथों घर लौटे, जिसको देखकर उनके पिता काफी नाराज व गुस्सा हुए। उस वक्त नानक जी ने कहा कि किसी जरूरतमंद की मदद कर और भूखे का पेट भरकर यदि उनका भला होता है तो इससे बड़ा मुनाफा क्या होगा।
इसी प्रकार गुरु नानक देव द्वारा ‘लंगर’ प्रथा की शुरुआत हुई, वह अक्सर अपने घर में भूखों को बुलाकर उनका पेट भरा करते थे।
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