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आज सुबह जब ट्विटर खोला तो पहले नम्बर पर जो हैशटैग ट्रेंड हो रहा था वो था ‘धरतीआबा बिरसामुंडा’। आखिर ये धरतीआबा बिरसामुंडा कौन है? और क्यों आज ये ट्विटर पर ट्रेंड हो रहे हैं? दरअसल धरती आबा बिरसा मुंडा आदिवासियों के लिए किसी सुपरहीरो से कम नहीं थे। उन्होंने आदिवासियों के हक के लिए अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। हालांकि, 25 साल की उम्र में रांची की जेल में उनकी रहस्यमयी हालातों में मौत हो गई थी।
आज उन्हीं ‘धरतीआबा बिरसामुंडा’ की जयंती है, उनका जन्म 1875 में झारखंड के रांची के उलीहातू गांव में हुआ था।
बिरसामुंडा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई सकला से की, हालांकि बाद में उन्होंने जर्मन मिशनरी स्कूल में दाखिला ले लिया। ईसाई धर्म अपनाने के बाद उन्होंने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी। वजह थी आदिवासी संस्कृति का अंग्रेजों के सामने मजाक बनना और उनपर दमन होना।
मुंडा एक जनजातीय समूह था, जोकि छोटा नागपुर में निवास करता था। बिरसामुंडा बचपन से ही ब्रिटिश शासकों के द्वारा की गई बुरी दशा के बारे में सोचते रहते थे और उनके खिलाफ आवाज उठाने का मन बना बैठे थे। जैसे ही वह युवा हुए उन्होंने मुंडा समुदाय के लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए मोर्चा खोल दिया। 1 अक्टूबर 1894 को बिरसामुंडा ने सभी मुंडाओं को इक्ट्ठा करके अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आंदोलन भी किया। लेकिन अगले साल ही 1895 में अंग्रेजों ने उन्हें आदिवासी लोगों को भड़काने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। 2 साल जेल में सजा काटने के बाद वह फिर बाहर निकले और उन्होंने अपने कुछ शिष्यों के साथ मिलकर जनता की मदद करने का मन बनाया।
1897 से लेकर 1900 तक मुंडाओं ने अंग्रेजों की नाक में दम करके रख दिया था, उस दौरान बिरसा और उनके सिपाहियों का शस्त्र था ‘तीरकमान’। वह अंग्रेजों की गोलियों के आगे अपने तीरकमान ने हमला करते।
1898 में बिरसा के नेतृत्व में मुंडाओं और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेज उनके सामने टिक नहीं पाये। हालांकि बाद में इस युद्ध के बदले अंग्रेजों ने कई आदिवासी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था।
3 मार्च 1900 में बिरसा को चक्रधरपुर से अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया, इसके कुछ महीने बाद ही जून महीने में रांची की जेल में बिरसा को मृत पाया गया।
आज भी झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के लोग बिरसामुंडा को भगवान की तरह पूजते हैं।
धरतीआबा बिरसामुंडा के जीवन पर फिल्में भी बन चुकी है, जिसमें सबसे प्रमुख है ‘उलगुलान: एक क्रांति (2004)’।
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